आपलोगो को दो बातों के विषय में कहूँगा। एक तो राम और ईश्वर, दूसरी बात विज्ञान। 'राम' कहने से सब लोग साधारण तरह से जानते हैं कि जैसे हमलोग रामनवमी के दिन जहाँ-तहाँ उत्सव देखते हैं। गाँव में प्रतिमा बनती है। सब गाँवों में नहीं; लेकिन बहुत-से गाँवों में राम की प्रतिमा बनती है। लोग ठाकुरबाड़ी जाते हैं, वहाँ दर्शन करते हैं। दर्शन करके जानते हैं कि श्रीराम शरीर-धारी विशेष पुरुष थे, जैसा कि प्रतिमा में, चित्र में और ठाकुरबाड़ी में है। मृतिका की प्रतिमा में जैसा रूप है अथवा जो पहले से ही स्थापित प्रतिमा है, उसका दर्शन करके समझते हैं कि इसी तरह के राम थे। 'राम' कहने से प्रतिमा का रूप, राम का ख्याल आता है। जैसा देखते हैं, वैसा ही ख्याल में आवे, यह प्रचलित स्वाभाविक बात है। यह गलती में जानते हैं, ऐसी बात नहीं।
जो पढ़े-लिखे अधिक हैं, वे केवल रूपधारी राम ही नहीं समझते और भी समझते हैं। जैसे श्रीराम जब जंगल गए थे, तो वे वाल्मीकि के आश्रम में गए, वहाँ वार्ता हुई। वहाँ रूपवाले राम वाल्मीकि के सामने थे ही; लेकिन वाल्मीकिजी कहते हैं-
राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर । अविगत अकथ अपार, नेति नेति नित निगम कह ।।
एक तो रूपधाारी राम है, जो वचन में आते हैं और जिनके हाथ, पैर, मुँह, आँख, नाक, कान आदि इन्द्रियाँ हैं। जो इन्द्रिय ज्ञान में आवे, उसको गोचर पदार्थ कहते हैं। रूपधारी राम का चरण छुआ जाता है। वे साँवले हैं। उनकी सुन्दरता को देखते हैं, बुद्धि ग्रहण करती है। ऐसा रूप 'वचन अगोचर बुद्धि पर' नहीं कहा जाएगा। 'अविगत' का अर्थ है- जो कहीं से हीन नहीं, सर्वव्यापी हैं। हैं तो राम सामने ही; लेकिन कहते हैं कि सर्वव्यापी हैं, अलख हैं। धनुषधारी राम देखने में आते हैं और कहते हैं 'अलख'। नख से शिख तक देखते हैं; लेकिन कहते हैं 'अपार'। एक तो रूप और दूसरा स्वरूप होता है। एक तो शरीर का रूप होता है और दूसरा आत्मा का स्वरूप कहलाता है।
श्रीरामजी के शरीर को देखकर भी वाल्मीकि जी स्वरूप के लिए कहते हैं-इन्द्रियज्ञान में नहीं, बुद्धि से परे है, सर्वव्यापी है। देखने में आने योग्य नहीं। अपार है, वेद उसको नेति-नेति कहते हैं। राम का शरीर-रूप और राम का स्वरूप दोनों समझिए तो दोनों राम हैं। राम के दोनों रूपों का दर्शन और पहचान अच्छा है। देहरूप का दर्शन हो और आत्मस्वरूप का नहीं, तो काम बाकी रहेगा।
भगवान राम आज नहीं हैं। उनकी प्रतिमा है; लेकिन सभी प्रतिमाएँ एक-सी नहीं हैं। उनमें कौन-कौन-सी प्रतिमा ठीक हैं, कहा नहीं जा सकता। ग्रन्थ में जैसे रंग-रूप का वर्णन किया गया है, उसी के अनुकूल सभी चित्रकार बनाते हैं। जिस चित्रकार में जितनी प्रवीणता है, वे उतने अच्छे बनाते हैं। इसीलिए कम जाननेवाले चित्रकार के बनाए रूप में अन्तर पड़ जाता है; लेकिन जो स्वरूप है, उसकी प्रतिमा नहीं बन सकती।
शरीर-रूप राम को सगुण राम और जो अलख, अपार है, वह निर्गुण राम है। राम के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों का ज्ञान होना चाहिए। सगुण का ज्ञान इन्द्रियों से होता है और निर्गुण का ज्ञान चेतन आत्मा से होता है। बुद्धि से परे चेतन आत्मा है। चेतन आत्मा से जो जाना जाता है, वही अविगत, अलख, अपार राम है। शरीर प्रकट होता और गुप्त भी होता है। स्वरूप के होने का कारण नहीं होता; किंतु शरीर के होने का कारण होता है। स्वरूप का होना किसी सबब (वजह) से - नहीं होता। वह परम प्राचीन है, परम सनातन - है। ऐसा जो पदार्थ है, वही अविगत, अलख, अपार है। समय-समय जो भगवान का अवतार होता है, उसमें कारण होता है। राम के अवतार के कई कारण हैं। सब अवतारों के कई कारण हैं। सब अवतारों में एक ही - रंग-रूप नहीं, विविध रंग-रूप। राम-रूप में, - श्याम-रूप में बड़ा सुन्दर और नृसिंह रूप - बड़ा भयंकर। वामन अवतार में बहुत छोटा -रूप, केवल बावन अंगुली का।
असल में परमात्मा का ज्ञान अकथ, अपार के दर्शन से होता है। यह दर्शन शरीर में रहने से नहीं होता। शरीर से पृथक् होकर शरीर में रहो, तब अपने में अपने से दर्शन होगा। ऐसा होने से तमाम दर्शन पाओगे। आँख से नहीं देखोगे, अपने से देखोगे। तुम स्वयं शरीर नहीं हो। गाँव में कभी-न-कभी कोई अवश्य मरता है और उसकी श्राद्ध-क्रिया होती है। सभी धर्मों में श्राद्ध-क्रिया होती है, किसी-न-किसी रूप में। इसमें विश्वास रहता है कि शरीर छूट गया है, चेतन आत्मा - कहीं चली गई है। उसकी शुभ गति हो, इसलिए श्राद्ध-क्रिया होती है।
शरीर से केवल चेतन आत्मा नहीं निकलती। इस स्थूल शरीर से सूक्ष्म, कारण, महाकारण के सहित चेतन आत्मा निकल जाती है। ये तीन शरीर मरते नहीं। अपने स्वयं कोई शरीर नहीं है, शरीर निवासी है। जैसे दूध को मथते-मथते आखिर में उससे मक्खन अलग हो जाता है और उसी में रहता है। फिर - आप अलग करते हैं। इसी तरह चेतन आत्मा - शरीर में रहे और शरीर से फूटकर रहे, तब - पहचान में आवेगा कि यही मैं हूँ, और यही राम है, जो 'अविगत अलख अपार' है। सगुण, राम के दर्शन से माया में बहुत बढ़ती होती है और निर्गुण राम के दर्शन से मोक्ष होता है। निर्गुण राम अलग और सगुण राम अलग नहीं रहता। शरीर को पहन लिया तो सगुण है। सब शरीरों को छोड़ दिया, वह निर्गुण है। जो भजन करता है, वह शरीर से वैसे निकलकर रहता है, जैसे दूध से मक्खन। वही जीवनमुक्त होता है, वही अपने को पहचानता है और राम के स्वरूप को भी।
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