S131 (क) भारतीय शिक्षा और संस्कृति का शुभारंभ माता के पेट से || Praacheen Bhaarateey Shiksha

महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर / 131

     प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के हिंदी प्रवचन संग्रह "महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर" के प्रवचन नंबर 131 में बताया गया है कि  भारतीय शिक्षा से आप क्या समझते हैं, भारत में शिक्षा का स्तर क्या है, भारतीय शिक्षा व्यवस्था, प्राचीन भारतीय शिक्षा की विशेषताएं, भारतीय शिक्षा का इतिहास और विकास, प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्य, भारतीय शिक्षा प्रणाली की विशेषताएं,  इत्यादि के बारे में ।  आइये इस प्रवचन का पाठ करने के पहले गुरु महाराज का दर्शन करें- 

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Indian culture, प्राचीन भारतीय शिक्षा की जानकारी हिंदी में देते हुए गुरु महाराज जी
 भारतीय शिक्षा पर प्रवचन

भारतीय संस्कृति का आरंभ माता के पेट से

     प्रभु प्रेमियों ! इस प्रवचन (उपदेश, अमृतवाणी, वचनामृत, सत्संग सुधा, संतवाणी, गुरु वचन, उपदेशामृत, ज्ञान कथा, भागवत वाणी, संतवचन, संतवचन-सुधा, संतवचनामृत, प्रवचन पीयूष ) में पायेंगे कि- 
1. नम्रतायुक्त सत्य वचन कैसे बोलना चाहिए?    2. गुरु महाराज किस विषय का प्रचार करते हैं?   3. सांस्कृतिक कार्य का महत्व   4. हमारे देश की संस्कृति का पहला पाठ क्या है?    5. रामायण के अनुसार सुबह उठकर क्या करना चाहिए? रामायण का पहला पाठ क्या है?   6. प्रणाम करने से क्या फायदा होता है?   7. समुचितरूपेण सुसंस्कारित बच्चे कैसे हो सकता है?    8. कोई चीज कैसे बनी है?    9. माता के पेट में ही ज्ञान सीखे हुए बच्चे कौन-कौन थे?    10. हमारी बातों का असर क्यों नहीं होता? हमारी बातों का असर कैसे होगा ?  मोहम्मद साहब और बुढ़िया की कहानी।   11. शीलता किसे कहते हैं?   12. भारतीय आर्य की क्या पहचान  हैं?   13. विद्यार्थी और अध्यापक का व्यवहार कैसा होना चाहिए?    14. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन  करने से क्या होता है?    15. संशय कैसे छूटता है?   16. ज्ञानी और भक्त किसे कहते हैं?    17. धूर्त्त और होशियार में क्या अंतर है?    18. सादा जीवन और उच्च विचार के प्रतीक कौन थे?     19. कर्मी और अकर्मी  कौन है? पाखंडी किसे कहते हैं?   इत्यादि बातें। इन बातों को आसानी से समझने के लिए उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर प्रश्न नंबर देकर किया गया है। जिससे प्रवचन समझने में सरस हो जाय। आइये प्रवचन पढ़े ं- 

प्रवचन करते गुरुदेव और सुनते हुए भक्तगण,
प्रवचन करते गुरुदेव

प्यारे विद्वानवृन्द तथा छात्रवृन्द !

     1. आपके महाविद्यालय में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिषद् भी है, यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। आज आप उसका वार्षिक महोत्सव मना रहे हैं, जिसके उद्घाटन का भार आपने मेरे ऊपर दिया है। किंतु मैं एक ऐसा आदमी हूँ, जो एकपक्षीय है । एक ही विषय को जानता है। मैं नहीं जानता कि उद्घाटन किस तरह किया जाय। 

     2. मैं आध्यात्मिक प्रचार करता हूँ । मुझे विश्वास हो गया है कि बिना आध्यात्मिकता के राजनीति में शान्ति नहीं आ सकती। संतों ने जगत कल्याणार्थ आध्यात्मिकता के प्रचार का काम किया और आज भी वही बात चल रही है। इसका तो प्रचार होता ही है।

    3. सांस्कृतिक कार्य मनुष्य को सुधारकर उसके उदात्त गुणों को विकसित करता है। हमलोग सुधरे हुए कम हैं। कभी देखने में आता है कि सुधरे हुए नहीं हैं । इसलिए हमको सीखना होगा कि सुधरें कैसे ? अच्छे आचरण से चलें, यही सुधार है। यदि अच्छे आचरण से नहीं चलें तो सुधार नहीं है। अच्छा सुधार बिना अच्छे संग और अच्छी विद्या के नहीं हो सकता। अच्छे आचरण से संसार में रहें, इसके लिए विद्या की बड़ी आवश्यकता है। साथ ही यह भी देखें कि हमारे यहाँ जो महान हुए, उनका आचरण कैसा था ? उनके आचरण के मुताबिक चलें  तो हमारा कल्याण होगा।

योग गुरु जी, भारतीय योगाचार्य,
योग गुरु जी

     4. एक साधुवेशी हैं, वे मिड्ल स्कूल तक जाकर आसन सिखलाते हैं। एक जगह वे गए और जाकर विद्यार्थियों से पूछा कि प्रातः काल उठकर आप क्या करते हैं ? सबों ने उत्तर में बताया कि वे सुबह में उठकर क्या करते हैं । किंतु प्रश्नकर्ता किसी के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए । यही प्रश्न उन्होंने अध्यापकों से भी पूछा और उनके उत्तर भी संन्यासी को ठीक नहीं जँचे। उन्होंने कहा कि आपलोग तुलसीकृत रामायण नहीं पढ़ते हैं, इसलिए आपलोग नहीं जानते हैं कि प्रातः काल क्या करना चाहिए? 

प्रातकाल उठिकै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा ।। 

      5. यह ! यह नहीं कि एक दिन, बल्कि प्रत्येक दिन। हमारे देश में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम आदर्श राजा हुए। उनके नमूने पर हम चलें तो हमारा सुधार हो। यह देखिए कि उपर्युक्त आचरण अपने में है कि नहीं। 

साष्टांग प्रणाम, प्रणाम करने का महत्व, प्रणाम कैसे करते हैं,
साष्टांग प्रणाम 

     6. भगवान बुद्ध का वचन है- 'जो बूढ़ों को प्रणाम और आदर करते हैं, उनकी चार चीजें , बढ़ेंगी – आयु, सुख, सुन्दरता और बल।' आप पूछेंगे कि भगवान बुद्ध ने यों ही कहा या होना भी संभव है, तो कहूँगा - होना संभव है । जिनको आप प्रणाम कीजिएगा, उनकी शुभेच्छा आपके प्रति होगी, यह संभव ही है। आज के वैज्ञानिक विद्वान भी कहते हैं कि मनोबल में भी कुछ बल है । शुभेच्छा में भी मनोबल है । जिसके लिए शुभेच्छा की गई, उसकी भलाई हो, पूर्णतया संभव है। भगवान बुद्ध महान व्यक्ति थे। वे विशेष अवतारों में गिने गए हैं। उनका वचन मिथ्या नहीं है। 

     7. हमारा सुधार माता की गोद से ही होना चाहिए अथवा माता के पेट से ही सुसंस्कारित करने का प्रयत्न होना चाहिए । इसका अर्थ है-- माता-पिता स्वयं समुचितरूपेण सुसंस्कृत हों। आपको आश्चर्य होगा कि बच्चा पेट में भी वेद पढ़ता है। पराशर मुनि शक्ति मुनि के पुत्र थे और शक्ति मुनि वशिष्ठ के पुत्र थे । वशिष्ठ के सौ पुत्र थे, वे मारे गए थे। उन्होंने देखा कि एक पतोहू के गर्भ में बालक है, इसलिए उसकी किसी तरह सुरक्षा की जाय । उसको सुरक्षित स्थान में रखने के के लिए वे कहीं ले जा रहे थे । वशिष्ठ आगे और पतोहू पीछे थी। शक्ति मुनि की तरह कण्ठ स्वर से वह पेट का बच्चा वेद-ऋचा गाता था । वशिष्ठ ने कहा - 'पुत्री ! यह कौन गा रहा है ?' पतोहू बोली कि वह आपका पोता है, जो मेरे गर्भ में है । आपको आश्चर्य होगा कि यह कैसे संभव है ! किंतु परमात्मा की सृष्टि में क्या नहीं हो सकता ! 

     8. एक विद्वान आज कहते हैं कि सब मैंने बनाया। मैंने कहा कि संसार - भण्डार से कुछ लिए बिना एक घास या एक चुटकी मिट्टी बना दीजिए, हो नहीं सकता। ईश्वर की लीला अद्भुत है। परमात्मा की आश्चर्यमयी लीला है। कौन चीज कैसे बनी, कोई ठीक-ठीक कह नहीं सकता । 

वीर अभिमन्यु, चक्र व्यूह में अभिमन्यु, अर्जुन पुत्र अभिमन्यु,
वीर अभिमन्यु

     9. प्रह्लाद अपनी माता के पेट में था। नारद ने जो ज्ञान प्रह्लाद की माता को सुनाया, वह ज्ञान प्रह्लाद को मिल गया और गर्भ से ही ज्ञान - ध्यान लेता आया । चक्रव्यूह का भेदन करना कोई नहीं जानता था, एक अर्जुन जानता था; किंतु वह दूसरी जगह युद्ध करने के लिए चला गया था। जिस समय अभिमन्यु पेट में था, उसी समय उसकी माता ने अर्जुन से जिज्ञासा की थी कि चक्रव्यूह में कैसे प्रवेश किया जाता है ? उन्होंने वर्णन किया और उस विद्या को अभिमन्यु ने गर्भ में ही सीख लिया। संस्कृति का आरम्भ माता के पेट से होता है । इसके लिए चाहिए कि माता-पिता दोनों सुसंस्कृत हों और जन्म होने पर माता-पिता उसको अच्छे आचरण से रखें। घर का आचरण अच्छा हो । पाठशाला में जब वह जाय तो अध्यापक के उत्तम आचरण को देखकर बच्चे भी अच्छे आचरण सीख सकें।
बुढ़िया के बच्चे, मोहम्मद साहब और बुढ़िया की कहानी,
बुढ़िया के बच्चे

     10. मुहम्मद साहब के पास एक बुढ़िया अपने पोते को ले गई, जिसको सर्दी हुई थी। मुहम्मद साहब बोले- 'इसे कल ले आना।' दूसरे दिन बुढ़िया फिर अपने पोते को लेकर मुहम्मद साहब के पास गई। मुहम्मद साहब बोले- 'आज जाओ, इसे कल ले आना।' बुढ़िया फिर मुहम्मद साहब के पास आई । इस प्रकार कई दिनों तक लगातार उस बुढ़िया को मुहम्मद साहब बुलाते रहे और बुढ़िया आती रही । अन्त में मुहम्मद साहब बोले कि बच्चे को शक्कर नहीं खिलाओ, सर्दी छूट जाएगी । बुढ़िया भिन्नाई और बोली- ' आपने पहले ही दिन यह बात क्यों नहीं कही, जो आज लगातार कई दिनों तक हैरान कर लेने के बाद आपने यह बात कही है। मुहम्मद साहब बोले- मुझे भी सर्दी लगी थी और मैं भी शक्कर खाता था। किंतु शक्कर छोड़ देने पर मेरी सर्दी छूट गई । यदि मैं शक्कर खाता और दूसरों को शिक्षा देता कि शक्कर मत खाओ तो इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मैंने शक्कर खाना छोड़ दिया है, तब आज मैंने तुमसे कहा है । इसी तरह हमारे आचार्यगण, अध्यापकगण अपने में अच्छे आचरण लावें तो लड़के भी अच्छे आचरण से रहेंगे। 

     11. उत्तम संस्कृति के लिए बड़ों का आदर और उनके सामने नम्र अवश्य रहें और अपने से छोटे को प्यार करें। यह शीलता है। शीलता कहते हैं सत्यता और नम्रता से मिल-जुलकर जो व्यवहार होता है। दिखलावे की बात नहीं हो, जो हो, सच्चाई की बात हो। तब हम अच्छे होंगे और हमारी संस्कृति अच्छी होगी । कितना अच्छा है कि-

प्रातकाल उठिकै रघुनाथा । मातु पिता गुरु नावहिं माथा ।। 

     12. यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपने भारतीय आर्य के संस्कारों को छोड़ दिया है, यदि करते हैं तो भारतीय आर्य हैं। यों तो कई देश के लोग अपने को आर्य कहते हैं, किंतु हम भारतीय आर्य हैं। यदि हम नम्र नहीं होते हैं तो हम अपनी सुसंस्कृति छोड़ते हैं। 

विद्यालय और विद्यार्थी, विद्यालय में पढ़ते और उधम मचाते बच्चे,
विद्यालय और विद्यार्थी

     13. आजकल विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोग ऐसे बरतते हैं, जिससे अन्य लोग कुछ कहने लग गए हैं। लोगों को विद्यार्थी और अध्यापक दोनों के पक्ष में संशय हो गया है। जितने विद्यालय और महाविद्यालय हैं, उनमें - नम्रता तोड़कर व्यवहार करते प्राय: देखा जाता है । ये ऐसे संस्थान हैं, जहाँ से हम उत्तम संस्कार लेकर सुसंस्कृत होते हैं। यदि हम यहाँ भी नहीं सीखें तो फिर कहाँ जाकर सीखेंगे ? यहाँ से शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद आप जहाँ कहीं भी रहें, वहाँ इतनी उत्तमता से रहें कि देश का कल्याण हो । हमको गौरव है कि हम परराज्य में नहीं रहते, अपने राज्य में हैं । इसमें उत्तमता तभी आवेगी, जब हम सुधरे हों । इसके लिए शील धारण कीजिए । शील निभाना है, तो आवश्यक यह है कि जिस काम के लिए जो व्रत है, उसमें मजबूत रहो । 

     14. आर्य संस्कार में तो विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। आचार्य गृहस्थ होते हुए भी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे । यहाँ ब्रह्मचर्य व्रत पर बहुत ख्याल रखना चाहिए। जहाँ ब्रह्मचर्य व्रत पर ख्याल नहीं है, वहाँ ओजपूर्ण तेज नहीं हो सकता, विद्या-ग्रहण की शक्ति पूर्णतया विकसित नहीं हो सकती। आपके महाविद्यालय में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिषद् का भी स्थान है, यह बहुत अच्छा है। सभी विद्यालयों में इस परिषद् का रहना अच्छा है। 

भक्त सूरदास जी महाराज, भक्ति पद गाते हुए भक्त सूरदास,
भक्त सूरदास जी महाराज

     15. अभी आपलोगों ने सूरदासजी की वाणी सुनी। इसकी पुष्टि वेद, उपनिषद् और भगवद्गीता के वाक्यों में भी है। किंतु साक्षात्कार के बिना फिर भी संशय रह जाता है। ऐसा कहकर मैं ग्रंथों की निन्दा नहीं करता हूँ। ग्रंथों से ही साक्षात्कार नहीं होता, साधन द्वारा साक्षात्कार होता है और साक्षात्कार होने पर ही संशय छूटता है। सूरदासजी की वाणी को फिर दुहराता हूँ। वे कहते हैं-

अपुनपौ आपुन ही में पायो । 
शब्दहिं   शब्द   भयो   उजियारो,   सतगुरु    भेद  बतायो । 
ज्यों      कुरंग   नाभि   कस्तूरी,   ढूँढ़त   फिरत    भुलायो । 
फिर चेत्यो जब चेतन ह्वै  करि,    आपुन  ही   तनु   छायो ॥ 
राज कुँआर कण्ठे  मणि भूषण,    भ्रम भयो कह्यो गँवायो । 
दियो बताइ और सत  जन तब,    तनु   को  पाप   नशायो । 
सपने माहिं नारि को भ्रम भयो,    बालक   कहुँ     हिरायो । 
जागि लख्यो ज्यों को त्यों ही है,   ना   कहूँ  गयो  न आयो ।
सूरदास समुझे की यह गति,     मन   ही   मन     मुसुकायो । 
कहि न जाय या सुख की महिमा,    ज्यों   गूंगो  गुर  खायो ।

     16. पहले श्रवण-मनन अवश्य चाहिए, इसके बाद फिर अभ्यास भी करना चाहिए। सुनिए, समझिए और अपने अंदर में चलिए । जबतक अपने अंदर नहीं चले, तबतक आध्यात्मिकता पूरी हो नहीं सकती । आत्मा की तरफ लोग दो तरह से चलते हैं। एक आत्म उपासी बनकर अपनी खोज में आप जाते हैं। यह ज्ञान का पथ हैदूसरा भक्ति मार्गी बनकर; वहाँ भक्त - भक्ति - भगवन्त तीनों यानी त्रिपुटी रहती है। कबीर साहब भक्त बनते हैं, भगवान को अपना मित्र और प्रभु बनाते हैं और उसको पाना अपने अंदर में बताते हैं और पानेवाला प्रेम का पागल होता है । इसलिए-

हमन है इश्क मस्ताना  हमन   को   होशियारी क्या । 
रहें आजाद या जग से,   हमन दुनिया से यारी क्या ।। 
जो बिछुड़े हैं   पियारे  से,   भटकते दर ब दर फिरते । 
हमारा     यार   है   हममें,  हमन को इन्तजारी क्या ।। 
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है। 
हमन गुरुनाम    साँचा है,  हमन दुनियाँ से यारी क्या ।। 
न पल बिछुड़े पिया हमसे,    न हम बिछुड़े पियारे से । 
उन्हीं से   नेह   लागी  है,    हमन को   बेकरारी क्या ।। 
कबीरा इश्क का   माता,   दूई को  दूर   कर  दिल से ।
जो चलना राह नाजूक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ।। 
सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक संत कबीर साहेब
सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक कबीर 

     17. होशियारी नहीं तो क्या, बेवकूफी में रहने को कहा है? धूर्त्त भी होशियार होता है, जिसको अंग्रेजी में कनिंग (Cunning) कहते हैं। धूर्तता छोड़कर कबीर साहब होशियार थे। आजकल बहुधा धूर्तता की होशियारी है। ऐसी होशियारी को छोड़कर शुद्ध और सीधा रास्ता पकड़ो और उसमें होशियार रहो । ‘रहें आजाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या ।' दुनिया से यारी मत करो तो क्या वैर करो? नहीं । आसक्ति छोड़कर रहो, अपनी सच्ची कमाई करो और अपना जीवन-यापन करो ।

कबीर चाले हाट को, कहे न कोई पतियाय ।
पाँच टके का दोपटा, सात टके को जाय ॥ 

     18. यह कथा प्रसिद्ध है। कबीर साहब इतने संतुष्ट थे । वे थोड़े में गुजर करनेवाले थे और आध्यात्मिकता के शिखर पर चढ़े हुए थे। यह संस्कार, यह संस्कृति अपने देश की है। वे आजाद क्यों थे? इसलिए कि सांसारिक पदार्थों की आसक्ति उन्हें नहीं थी । ऐसा नहीं कि घर में खर्च वर्च नहीं देते - चलाते थे या कि घर से अलग रहते थे। 

कपड़े तैयार करते हुए संत कबीर साहेब,
कपड़े बीनते संत कबीर 

     19. अकर्मी में कर्मी और कर्मी में अकर्मी रहोकर्म करो किंतु उसके फल में आसक्ति मत रखो, यह कर्म में अकर्म है और चुपचाप बैठा है, बाहर में कुछ नहीं करता है और भीतर में कर्म करता है, यह अकर्म में कर्म है। यह पाखण्ड है। किंतु बाहर में कुछ नहीं करे और भीतर से ईश्वर भजन करे तो यह उत्तम है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने कहा है कि यदि कोई माँ-बाप को मारता है और दूसरा कोई देखता है, कुछ बोलता नहीं है तो मारनेवाला तो विकर्म (निषिद्ध कर्म) करता ही है, साथ-ही- साथ वह देखनेवाला अकर्मी होते हुए भी उसके दुष्ट कर्म का भागी बनता है । विकर्म का अर्थ निषिद्ध कर्म है। क्रमश:

आगे है-

गांधीजी तथा रामानुजाचार्यजी ने भी बताया है । इससे विपरीत अर्थ कोई करे, तो मानने योग्य नहीं है । आजादी - स्वतंत्रता तभी पूरी होती है, जब विषय-भोगों से हृदय को छुड़ाकर रखा जाता है। विषय-भोगों में आसक्त रहने से हानि ही होती है। आप सांसारिक कामों को भी करें, किंतु अनासक्त होकर, तो यही हमारे यहाँ की सांस्कृतिक शिक्षा है।..... 


इस प्रवचन का शेष भाग पढ़ने के लिए 👉  यहाँ दवाएं। 


नोट-  इस प्रवचन में निम्नलिखित रंगानुसार और विषयानुसार ही  प्रवचन के लेख को रंगा गया या सजाया गया है। जैसे-  हेडलाइन की चर्चा,   सत्संग,   ध्यान,   सद्गगुरु  ईश्वर,   अध्यात्मिक विचार   एवं   अन्य विचार   । 


इसी प्रवचन को "महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा सागर"  में प्रकाशित रूप में पढ़ें- 


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S131_Aantarik_pase2
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     प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के इस प्रवचन का पाठ करके आपलोगों ने जाना कि योगीजन जगते हैं - भारतीय संस्कृति का महत्व, संस्कृति का महत्वपूर्ण निबंध, संस्कृति का अर्थ, संस्कृति की विशेषताएं, संस्कृति का स्वरूप, संस्कृति और समाज, भारतीय संस्कृति का अर्थ, संस्कृति का क्या महत्व है? भारतीय संस्कृति का महत्व क्या है?  इत्यादि बातें।  इतनी जानकारी के बाद भी अगर कोई संका या प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस प्रवचन के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने इससे आपको आने वाले प्रवचन या पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। उपर्युक्त प्रवचन का पाठ निम्न वीडियो में किया गया है। जय गुरु महाराज।




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S131 (क) भारतीय शिक्षा और संस्कृति का शुभारंभ माता के पेट से || Praacheen Bhaarateey Shiksha S131 (क)  भारतीय शिक्षा और संस्कृति का शुभारंभ माता के पेट से  ||  Praacheen Bhaarateey Shiksha Reviewed by सत्संग ध्यान on 7/27/2023 Rating: 5

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