Ad1

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज एक परिचय

सद्गुरु महर्षि मेंहीं एक परिचय

प्रभु प्रेमियों ! सत्संग ध्यान ब्लॉग में सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के प्रवचनों का संग्रह है। स्वभाविक है कि सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज कौन हैं? इसकी जिज्ञासा सबों को होगी ? अतः यहां पूज्यपाद छोटेलाल बाबा जी महाराज द्वारा लिखित गुरु महाराज के संक्षिप्त जीवन परिचय यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। गुरुुुु महाराज के बारे में जाननेे के पहले उनका दर्शन करें- 

विविध रूप में गुरुदेव
विविध रूप में गुरुदेव

संतों की अविच्छिन्न परम्परा और गुरुदेव

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज एक परिचय Paramahansa ji is an introduction to Sadguru Maharshi। सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंसजी महाराज ऋषियों और सन्तों की दीर्घकालीन अविच्छिन्न परम्परा की अद्भुत आधुनिकतम कड़ी के रूप में परिगणित हैं । भागलपुर नगर के मायागंज महल्ले के पास पावन गंगा - तट पर अवस्थित इनका भव्य विशाल आश्रम आज भी अध्यात्म - ज्ञान की स्वर्णिम ज्योति चतुर्दिक बिखेर रहा है ।

महर्षि का अवतरण

चल कुर्सी पर गुरुदेव, व्हील चेयर पर गुरुदेव,
चलकुर्सी पर गुरुदेव
महर्षि का अवतरण विक्रमी संवत् १ ९ ४२ के वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि तदनुसार २८ अप्रैल , सन् १८८५ ई ० , मंगलवार को बिहार राज्यान्तर्गत सहरसा जिले ( अब मधेपुरा जिले ) के उदाकिशुनगंज थाने के खोखशी श्याम ( मझुआ ) नामक ग्राम में अपने नाना के यहाँ हुआ था । जन्म से ही इनके सिर पर सात जटाएँ थीं , जो प्रतिदिन कंघी से सुलझा दिये जाने पर भी दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः अपने - आप सात - की - सात जटाओं में उलझ जाती थीं । लोगों ने समझा कि अवश्य ही किन्हीं योगी - महात्मा का जन्म हुआ है । 

गुरुदेव का नामकरण

फूलों के बीच गुरुदेव
फूलों के बीच गुरुदेव
ज्योतिषी ने इनका जन्मराशि का नाम ' रामानुग्रहलाल दास ' रखा । पीछे इनके पिता के चाचा श्रीभारतलाल दासजी ने इनका नाम बदलकर में ही लाल ' रख दिया । बाद में इनके अन्तिम सद्गुरुदेवजी महाराज ने भी इनके इस नाम की उपयुक्तता एवं सार्थकता का सहर्ष समर्थन किया । महर्षि का पितृगृह पूर्णियाँ जिलान्तर्गत बनमनखी थाने के सिकलीगढ़ धरहरा नामक ग्राम में है ।

कुल और माता-पिता

संबंधियों बीच गुरुदेव
संबंधियों बीच गुरुदेव
मैथिली कर्ण कायस्थ - कुलोत्पन्न इनके पिता श्रीबबुजनलाल दासजी यद्यपि आर्थिक दृष्टि से बड़े सम्पन्न थे , तथापि शौक से वर्षों तक बनैली राज्य के कर्मचारी रहे । जब महर्षि केवल ४ वर्ष के थे , तभी इनकी सौभाग्यशालिनी माता जनकवतीजी का देहान्त हो गया ।

गुरुदेव का लालन-पालन

जन्मभूमि धरहरा में गुरुदेव
जन्मभूमि धरहरा में गुरुदेव
बालक महर्षि को इनके पिता और इनकी बड़ी बहन झूलन देवीजी ने इतने स्नेह और सुख - सुविधापूर्ण वातावरण में पालित - पोषित किया कि इन्हें अपनी माता का अभाव कभी खटक नहीं पाया । ५ वर्ष की अवस्था में मुण्डन - संस्कार होने के बाद अपने गांव की ही पाठशाला में इनकी प्रारंभिक शिक्षा आरंभ हुई , जिसमें इन्होंने कैथी लिपि के साथ - साथ देवनागरी लिपि भी सीखी ।

प्रारंभिक शिक्षा और वैराग्य

गंभीर चिंतन में गुरुदेव और वैराग्य।
गंभीर चिंतन में गुरुदेव
प्रारंभिक शिक्षा समाप्त करके इन्होंने ग्यारह वर्ष की अवस्था में पूर्णियाँ जिला स्कूल में पुराने अष्टम वर्ग में अपना नाम लिखवाया । यहाँ उर्दू , फारसी और अँगरेजी में कक्षा की पाठ्य पुस्तकें पढ़ने के साथ - साथ , पूर्व आध्यात्मिक संस्कार से प्रेरित होकर रामचरितमानस , महाभारत , सुखसागर आदि धर्मग्रंथों का भी अवलोकन करते और शिव को इष्ट मानकर उनके प्रति जल चढ़ाया करते । इसी अवधि सन् १ ९ ०२ ई ० में इन्होंने जोतरामराय ( जिला पूर्गियाँ ) के एक दरियापंथी साधु स्वामी श्रीरामानन्दजी से मानस जप , मानस ध्यान और खुले नेत्रों से किये जानेवाले बाटक को दीक्षा ले ली और नियमित रूप से अभ्यास करने लगे । योग - साधना की ओर बड़ती हुई अभिरुचि के कारण अब ये पाठ्य पुस्तकों की ओर से उदासीन होने लगे और मन - ही - मन साधुओं की संगति चाहने लगे ।

प्रबल वैराग्य और गृह त्याग

प्रवचन करते गुरुदेव।
प्रवचन करते गुरुदेव
सन् १ ९ ०४ ई ० की ३ जुलाई से प्रारंभ हो रही एन्ट्रेस ( प्रवेशिका ) के फर्स्ट क्लास ( आधुनिक मैट्रिक ) की परीक्षा में ये सम्मिलित हुए । दूसरे दिन की अंगरेजी परीक्षा के प्रश्नपत्र के पहले प्रश्न में ' Builders ' ( बिल्डर्स ) नामक कविता की जिन प्रारंभिक चार पंक्तियों को उद्धृत करके उनकी व्याख्या अंगरेजी में लिखने का निर्देश किया गया था , वे इस प्रकार दो For the structure that we raise , Time is with material's field . Our todays and yesterdays , Are the blocks with which we build . इन पंक्तियों को उद्धृत करके इनकी व्याख्या लिखते - लिखते इनमें वैराग्य की भावना इतनी प्रबल हो गयी कि इन्होंने मानस की यह अर्धाली "देह घरे कर यहि फल भाई । भजिय राम सब काम बिहाई ॥ " लिखकर परीक्षा - भवन का परित्याग कर दिया और यहीं इनकी स्कूली शिक्षा का भी अन्त हो गया ।

गुरुदेव संघ महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
गुरुदेव संग महर्षि मेंहीं

सन्यास और साधना

गंभीर ध्यान अभ्यास करते सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज
गंभीर ध्यानाभ्यास
इन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहकर ईश्वर की भक्ति में अपना समस्त जीवन बिता देने का संकल्प किया । ये आरम्भ के अपने गुरु स्वामी श्रीरामानन्दजी की कुटिया आ गये और वहाँ उनकी निष्ठापूर्वक सेवा करते हुए रहने लगे । जब इन्होंने देखा कि गुरुजी इनकी जिज्ञासाओं का समाधान नहीं कर पा रहे हैं , तब ये किन्हीं सच्चे और पूर्ण गुरु की खोज के लिए निकल पड़े । भारत के अनेक प्रसिद्ध धार्मिक स्थानों की इन्होंने यात्राएं की ; परन्तु कहीं भी इनके चित्त को समाधान नहीं मिला । अन्त में , इन्हें जब जोतरामराय - निवासी बाबू श्रीधीरजलालजी गुप्त द्वारा मुरादाबाद - निवासी परम संत बाबा देवी साहब और उनकी सन्तमत - साधना के विषय में पता लगा , तब इनके हृदय में सच्चे गुरु और सच्ची साधना - पद्धति के मिल जाने की आशा बंध गयी । बड़ी आतुरतावश इन्होंने १ ९ ० ९ ई ० में बाबा देवी साहब - द्वारा निर्दिष्ट दृष्टियोग की विधि भागलपुर नगर के मायागंज - निवासी बाबू श्रीराजेन्द्रनाथ सिंहजी से प्राप्त की , तो इन्हें बड़ा सहारा मिला । उसी वर्ष विजया दशमी के शुभ अवसर पर श्रीराजेन्द्रनाथ सिंहजी ने भागलपुर में ही बाबा देवी साहब से इनकी भेंट कराकर उनके हाथ में इनका हाथ थमा दिया । बाबा देवी साहब - जैसे महान् सन्त को पाकर ये निहाल - से हो गये । उनके दर्शन - प्रवचन से इन्हें बड़ी शान्ति और तृप्ति का बोध हुआ ।

स्वाबलंबी जीवन और संतमत

मेहनती गुरुदेव, प्रारंभिक अवस्था के गुरुदेव।
मेहनती गुरुदेव
एकमात्र मधुकरी वृत्ति के द्वारा जीवन - निर्वाह करते हुए ईश्वर - भक्ति करने की इच्छा रखनेवाले इन युवा संन्यासी को बाबा देवी साहब ने कड़ी डाँट लगाते हुए स्वावलम्बी होकर जीवन बिताने का कठोर आदेश दिया और कहा कि स्थायी जीविका के लिए कोई काम करो ; यदि तुम सौ वर्ष जी गये , तो क्या खाओगे ! एक सच्चा शिष्य गुरु - आज्ञा की अवज्ञा करने का दुस्साहस कैसे कर सकता है ! विवश होकर इन्हें जीविका के लिए भंगहा ( पूर्णियाँ जिला ) और सिकलीगढ़ धरहरा में क्रमशः अध्यापन और कृषिकार्य अपनाना पड़ा । 

ईश्वर प्राप्ति और नादानुसंधान साधना

नादानुसंधान रत गुरुदेव, ईश्वर प्राप्ति के लिए गंभीर साधना में निमग्न
नादानुसंधान रत गुरुदेव
सन् १९१२ ई ० में बाबा देवी साहब ने स्वेच्छा से इन्हें शब्दयोग की विधि बतलाते हुए कहा कि अभी तुम दस वर्ष तक केवल दृष्टियोग का ही अभ्यास करते रहो । दृष्टियोग में पूर्ण हो जाने पर ही शब्दयोग का अभ्यास करना । शब्दयोग की विधि अभी मैंने तुम्हें इसलिए बता दी कि यह तुम्हारी जानकारी में रहे । बीच - बीच में इन्हें बाबा देवी साहब की सेवा करने और उनके साथ भारत के विभिन्न स्थानों में भ्रमण करने का भी मौका मिलता रहा । सन् १ ९ १ ९ ई ० में सिकलीगढ़ धरहरा में इन्होंने जमीन के नीचे एक ध्यान - कूप बनाया और उसमें लगातार तीन महीने तक अकेले रहकर तपस्यापूर्ण साधना की , जिसमें इनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया । सन् १ ९ १ ९ ई ० की १ ९ जनवरी को बाबा देवी साहब के परिनिवृत्त हो जाने के बाद इनके मन में इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर लेने की बारंबार प्रबल कामना उठती रही । सन् १ ९३३-३४ ई ० में इन्होंने पूर्ण तत्परता के साथ १८ महीने तक भागलपुर नगर के मायागंज महल्ले के पास गंगा - तट पर अवस्थित कुप्पाघाट की गुफा में शब्दयोग की गंभीर साधना की , फलस्वरूप ये आत्मसाक्षात्कार करने में सफल हो गये ।

संतमत का प्रचार-प्रसार

सत्संग प्रचार में गुरुदेव
सत्संग प्रचार में गुरुदेव
अब इनका ध्यान सन्तमत - सत्संग के प्रचार - प्रसार की ओर विशेष रूप से गया । इन्होंने सत्संग की एक विशेष नियमावली तैयार की । फिर क्या था ? जिलास्तर पर दो दिनों के लिए और अखिल भारतीय स्तर पर तीन दिनों के लिए जगह - जगह वार्षिक सत्संग - अधिवेशन होने लगे । इनके अतिरिक्त लोगों द्वारा प्रतिदिन नियत समय पर व्यक्तिगत और जब - तब सामूहिक सत्संग - ध्यानाभ्यास भी किया जाने लगा । लोग इनके विचारों से प्रभावित होते गये । इस तरह क्या बाल , क्या युवा , क्या वृद्ध - सभी तरह के लाखों स्त्री - पुरुषों ने इनके मधुर , स्नेहिल और उपकारी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर इनके साथ कदम - से - कदम मिलाकर अध्यात्म - पथ पर चलना स्वीकार किया । आज भारत के विभिन्न राज्यों और नेपाल , जापान , रूस , अमेरिका , स्वीडेन आदि देशों में फैले इनके शिष्यों की संख्या पर्याप्त है ।

नियमित सत्संग के लिए सत्संग मंदिर निर्माण

नियमित सत्संग करने हेतु विचार विमर्श करते सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज
नियमित सत्संग 
ढाई - तीन सौ से अधिक सत्संग - आश्रम देश - विदेशों में स्थापित हो चुके हैं , जिनकी देख - रेख प्रायः भारत - सरकार से निबंधित संस्था ' अखिल भारतीय सन्तमत - सत्संग - महासभा ' किया करती है । सन् १ ९ ६० ई 0 में स्थापित महर्षि में ही आश्रम , कुप्पाघाट , भागलपुर से प्रकाशित होनेवाली ' शान्ति - सन्देश ' मासिक पत्रिका के द्वारा लगभग ४६ वर्षों से महर्षि के संदेशों को घर - घर पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है ।

गुरुदेव के साहित्य

गुरुदेव के साहित्य,
गुरुदेव के साहित्य
महर्षि की १४ रचनाओं में इनके द्वारा संपादित और लिखित ' सत्संग - योग , चारो भाग ' का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है । इसमें ऋषियों , सन्तों , भगवन्तों , महात्माओं और आध्यात्मिक विद्वानों के विभिन्न विषयों से संबंधित महत्त्वपूर्ण वचनों का संकलन करके अध्यात्म - ज्ञान का सार समाविष्ट कर दिया गया है । इस अद्भुत ग्रन्थ के अन्तिम भाग में सूत्ररूप में साधना - पद्धतियों के साथ लिखे गये महर्षि के जिन उच्चतम दार्शनिक विचारों का संकलन हुआ है , उन्हें पढ़े और समझे बिना यदि कहा जाए कि कोई भी व्यक्ति वास्तविक वेदान्तज्ञान से अनभिज्ञ ही रह जाएगा , तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं होगी । इनकी पदावली के पद्य अपनी मिठासपूर्ण गेयता के लिए जन - जन में प्रसिद्ध हैं , जिनमें इन्होंने अपनी साधनात्मक अनुभूतियों को बड़ी ही सरलता और कुशलता से अभिव्यंजित किया है । ' रामचरितमानस - सार सटीक ' में इन्होंने गद्य में मानस की संक्षिप्त कथावस्तु प्रस्तुत करने के साथ - साथ उद्धृत ज्ञान , योग , भक्ति और नीतिपरक छन्दों की टीकाएँ करते हुए उनके जिन गूढ रहस्यों का उद्घाटन किया है , वे अन्यत्र खोजने पर भी नहीं मिलते । ' श्रीगीतायोग - प्रकाश ' में इन्होंने गीता के विचारों और योग - पद्धतियों का सन्तों के मतों एवं साधनाओं से मिल दिखाते हुए उनसे संबंधित उन भ्रान्तियों का निराकरण कर दिया है , जो बड़े - बड़े मनीषियों के भी मस्तक में घर किये हुए थीं । गीता के सही तात्पर्य को सरलतापूर्वक समझने की इच्छा रखनेवाले प्रत्येक अध्यात्मप्रेमी के लिए यह पुस्तक पठनीय है ।

संतमत और वेद-उपनिषद

निर्वाण स्थान को जोड़ता पुल।
निर्वणस्थान को जोरता पुल
' वेद - दर्शन - योग ' में इन्होंने वेदमत और सन्तमत का साम्य दिखाकर वर्षों से मानी जा रही वेदमत और सन्तमत के बीच की खाई को पाट दिया है । ' सन्तवाणी सटीक ' में सन्तवाणियों के गंभीर अर्थ की इनकी जो सूक्ष्म और सही पकड़ देखने में आती है , वह किसी मननशील विद्वान् के द्वारा नहीं , बल्कि महर्षि ही जैसे किन्हीं आत्मानुभव - प्राप्त महापुरुष से संभव है । 

सादा जीवन और उच्च विचार की परंपरा

जीवन की गहराई और संतमत सत्संग
जीवन की गहराई
सन्तमत अपनी मूलभित्ति उपनिषद् के वाक्यों को स्वीकार करता हुआ सन्तों के मौलिक विचारों में एकता के सम्यक् दर्शन करता है । पहले - पहल हाथरस के सन्त तुलसी साहब ने संकीर्ण पंथाई भावों से ऊपर उठकर सन्तमत के प्रचार - प्रसार का बीज भारत की भूमि में वपित किया ; उनसे आशीर्वाद प्राप्त किये हुए बाबा देवी साहब ने उस बीज को अंकुरित करके एक स्वस्थ पौधे का रूप दिया और महर्षि ने तो उसे एक विशालतर वृक्ष के ही रूप में परिणत कर दिया ।

प्रमाणिक प्रवचन और स्नेहिल व्यवहार

निर्वाण का प्रतीक सद्गुरु महर्षि मेंहीं समाधि मंदिर
निर्वाण का प्रतीक
महर्षि अत्यन्त सरल भाषा में प्रवचन करते हुए अपनी बातों को संपुष्ट करने के लिए बीच - बीच में वेद , उपनिषद् , गीता , रामायण , सन्तवाणी और धम्मपद के भी उद्धरण प्रस्तुत करते जाते थे । ये किसी भी देश के उत्थान के लिए आध्यात्मिकता को सर्वोपरि स्थान देते थे । इनका कथन था कि आध्यात्मिकता को अपनाये बिना क्रमशः सदाचारिता , सामाजिक नीति और राजनीति कभी भी ऊँची और उत्तम नहीं हो सकती । फिर बुरी राजनीति शासन सँभालने में समर्थ कैसे हो सकती है !

सुख-शांति से रहने का उपाय

शब्द रूप गुरुदेव।
शब्दरूप गुरुदेव
महर्षि का जन सामान्य के लिए उपदेश था कि ईश्वर की खोज के लिए कहीं बाहर मत भटको ; उसे मानस जप , मानस ध्यान , दृष्टियोग और नादानुसंधान ( सुरत - शब्दयोग ) के द्वारा अपने ही शरीर के अन्दर खोजो । ईश्वर की भक्ति करने के लिए कोई खास वेशभूषा धारण करने की जरूरत नहीं है । अपने घर - द्वार में रहो और अपने पसीने की कमाई से जीवन का निर्वाह करो । सच्चाई और संतोष को अपनाये रहो ; अपनी आवश्यकताएँ कम रखो - जीवन में सुखी रहोगे । सहनशील और नम्र बनकर रहना सीखो , तो उन्नति - ही - उन्नति करते जाओगे । मेल में बड़ा बल है , इसलिए सत्य व्यवहार अपनाते हुए आपस में मेल से रहो । झूठ , चोरी , नशा , हिंसा और व्यभिचार - इन पंच पापों से बचकर रहो ; गुरु और ईश्वर के प्रति आस्था - विश्वास बनाये रखो ; नित नियमित रूप से सत्संग - ध्यानाभ्यास करते रहो - कभी - न - कभी आवागमन के चक्र से अवश्य मुक्त हो जाओगे ।


गुरुदेव का निर्वाण और अंतिम उपदेश

सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज का अंतिम आश्वासन
अंतिम आश्वासन
इस संसाररूपी रंगमंच पर आकर प्रत्येक प्राणी अपनी - अपनी भूमिका अदा करके चल देता है । ईसा की बीसवीं शताब्दी के तीन - चौथाई से कुछ अधिक काल तक अपने ज्ञानालोक से समस्त जगत् को आलोकित करते हुए अध्यात्म - गगन का यह महान् सूर्य भी ८ जून , सन् १ ९८६ ई ० , रविवार को अपने जीवन के १०१ वर्ष पूरे करके हमारी आँखों से ओझल हो गया ; लेकिन सन्तमत के प्रचार - प्रसार के लिए पूज्यपाद स्वामी श्रीसंतसेवीजी महाराज और पूज्यपाद श्रीशाही स्वामीजी महाराज - जैसे दो तेजस्वी शिष्य अपने पीछे छोड़ गये । हमें उनका आश्वासन भी याद है कि मैं एकदम मोक्ष नहीं चाहता , तुमलोगों के उद्धार के लिए पुनः आऊँगा । इति।।


विभिन्न अवस्था में गुरुदेव
विभिन्न अवस्था में गुरुदेव


सद्गुरु महर्षि मेंहीं साहित्य सुमनावली


MS01 . सत्संग - योग ( चारो भाग )   MS02 . रामचरितमानस - सार सटीक  MS03 . वेद दर्शन - योग,   MS04 . विनय - पत्रिका - सार सटीक,  MS05 . श्रीगीता - योग - प्रकाश, भारती (हिन्दी),  MS05a . श्री गीतााा योग प्रकाश   (अंग्रेजी अनुवाद),    MS06 . संतवाणी सटीक   MS07 . महर्षि मॅहीं - पदावली   MS08 . मोक्ष दर्शन भारती (हिन्दी), MS08a . मोक्ष दर्शन अंग्रेजी अनुवाद,  MS09 . ज्ञान - योग - युक्त ईश्वर भक्ति ,   MS10 . ईश्वर का स्वरूप और उसकी प्राप्ति,   MS11 . भावार्थ - सहित घटरामायण - पदावली ,   MS12  .  सत्संग - सुधा , प्रथम भाग,    MS13. सत्संग सुधा , द्वितीय भाग,  MS14 . सत्संग - सुधा , तृतीय भाग  MS15 . सत्संग - सुधा , चतुर्थ भाग  MS16. राजगीर हरिद्वार दिल्ली सत्संग,.  MS17 . महर्षि मेंहाँ - वचनामृत , प्रथम खंड,   MS18 . महर्षि मेंहीं सत्संग - सुधा सागर भाग ,  MS19 . महर्षि मेंहीं सत्संग - सुधा सागर भाग 2, 
।।०।।


प्रभु प्रेमियों ! सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के बारे में विस्तार से जानने के लिए आप सत्यदेव शाह रचित पुस्तक "महर्षि मेंहीं चरित " पढ़ सकते हैं। पूज्य बाबा  श्री छोटेलाल
दास लिखित उपर्युक्त जीवन-चरित द्वारा आपने गुरु महाराज के बारे में जाना। इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस प्रवचन के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले प्रवचन या पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। निम्न वीडियो में संतसेवी जी महाराज द्वारा लिखित गुरु महाराज का संक्षिप्त परिचय श्रीमद्भागवत गीता पुस्तक के लिए लिखा गया है। उसका पाठ और लिपी देखें और सुनें।




महर्षि मेंहीं साहित्य ऑनलाइन बिक्री के लिए

सत्संग ध्यान स्टोर पर उपलब्ध सामग्री चित्र, स्टोर पर मिलने वाली वस्तुएं एवं पुस्तकें,
सत्संग ध्यान स्टोर की सामग्री
अगर आप सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की सभी पुस्तकों के बारे में जानना चाहते हैं या संतमत सत्संग से प्रकाशित अन्य पुस्तकों के बारे में विशेष रूप से जानना चाहते हैं तो     यहां दबाएं। 

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की पुस्तकें मुफ्त में पाने के लिए  शर्तों के बारे में जानने के लिए  यहां दवाएं

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज एक परिचय सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज एक परिचय Reviewed by सत्संग ध्यान on 7/16/2020 Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

प्रभु प्रेमियों! कृपया वही टिप्पणी करें जो सत्संग ध्यान कर रहे हो और उसमें कुछ जानकारी चाहते हो अन्यथा जवाब नहीं दिया जाएगा।

संतमत और बेदमत एक है, कैसे? अवश्य जाने

     प्रभु प्रेमियों ! सत्संग ध्यान के इस प्रवचन सीरीज में आपका स्वागत है। आइए आज जानते हैं-सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज ने यह सि...

Ad

Blogger द्वारा संचालित.