Ad1

S11, Definition of happiness and sorrow, where and how it is found, -महर्षि मेंहीं प्रवचन

महर्षि मेंहीं सत्संग सुधा सागर/11

प्रभु प्रेमियों ! संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के भारती (हिंदी) प्रवचन संग्रह "महर्षि मेंहीं सत्संग सुधा सागर" के प्रवचन नंबर 11 वे, में शांति दायक और संपूर्ण संतुष्टिदायक सूख आत्मज्ञान प्राप्त करने में है। इस संबंध में बिशेष चर्चा की गई है।

इसके साथ ही इस प्रवचन (उपदेश, अमृतवाणी, वचनामृत, सत्संग सुधा, संतवाणी, गुरु वचन, उपदेशामृत, ज्ञान कथा, भागवत वाणी, संत वचन, प्रवचन पीयूष )  में बताया गया है कि- शांति दायक और संपूर्ण संतुष्टिदायक सूख आत्मज्ञान प्राप्त करने में है। मनुष्य अज्ञानता बस जन्म से लेकर मृत्यु तक सुख प्राप्त करने के लिए चेष्टा करता रहता है, परंतु शांति दायक, तृप्तिदायक सुख सांसारिक वस्तुओं में नहीं है। एक अनंत, अखंड, अपरंपार शक्ति युक्त ईश्वर अवश्य है। उसे प्राप्त करने के लिए सदाचार का पालन करना अनिवार्य है। उस ईश्वर की प्राप्ति के बिना संपूर्ण संतुष्टि दायक सुख की प्राप्ति नहीं हो सकता, इत्यादि बातें। इन बातों को जानने-समझने के पहले, आइए !  संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दर्शन करें। 


इस प्रवचन के पहले वाले प्रवचन नंबर 10 को पढ़ने के लिए  यहां दबाएं।

Definition of happiness and sorrow, where and how it is found,वास्तविक सच्ची भक्ति पर चर्चा करते हुए -महर्षि मेंहीं। परम सुखी होने की युक्ति पर प्रवचन करते गुरुदेव
परम सुखी होने की युक्ति पर प्रवचन करते गुरुदेव

Definition of happiness and sorrow, where and how it is found,

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज कहते हैं कि-  प्यारे लोगो ! हम सब लोग सूख की ओर दौड़ते हैं । दुःख नहीं होने पावे , ऐसी इच्छा करते हैं  ।.....इस तरह प्रारंभ करके गुरुदेव-- Happiness and sorrow, what is happiness? Where and how do you get it? Definition of happiness, what is the greatest happiness? What is happiness? Meditation is the art of turning sorrow into happiness, what is the difference between happiness and sorrow? Definition of grief, God bless, Achieving ultimate happiness from God devotion, what is real true devotion? Articles on devotion, articles of devotion, transcendence, the basis of true devotion, attainment of ultimate happiness only through santmat satsang, articles on God Bhajan, God Bhakti,......   आदि बातों पर विशेष प्रकाश  डालते हैं। इन बातों को अच्छी तरह समझने के लिए इस प्रवचन को पूूूरे मनोयोग पूर्वक पढें-

११. ईश्वर - भक्ति से सुख की प्राप्ति 


ईश्वर भक्ति से ही सुख की प्राप्ति पर चर्चा करते सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज

प्यारे धर्मप्रेमी सज्जनो ! 

    हम सब लोग सुख की ओर दौड़ते हैं । दुःख नहीं होने पावे , ऐसी इच्छा करते हैं । इसके लिए जो यत्न जानने में आता है , उसका प्रयोग करते हैं , किन्तु फिर भी पूर्णरूपेण सफलता प्राप्त नहीं कर पाते । यह आज ही ऐसा यह बात नहीं । पौराणिक काल के इतिहास को पढ़कर देखते हैं , तो मालूम होता है कि तब के लोगों की भी यही हालत थी तथा आगे भी यही हालत रहे , संभव है । क्यों ? आखिर इसका कारण क्या है ? हमलोग उसी को सुख कहते हैं , जो मन और इन्द्रियों को सुहाता है तथा मन और इन्द्रियों को जो नहीं सुहाता , उसे ही दुःख कहते हैं । जो विषय जिस इन्द्रिय का है , वह विषय उस इन्द्रिय को मिलने से सुख तथा वही विषय उतना नहीं मिलने पर दुःख मानते हैं । किन्तु यथार्थतः इन विषयों से कभी भी तृप्त नहीं हो पाते । सुख की तलाश में अपनी शक्ति भर कोशिश करते हैं , फिर भी अतृप्ति ही रहती है । पहले के लोगों ने इस सुख के लिए स्वर्ग पाने की कोशिश की ; क्योंकि वहाँ विशेष सुख है । अत : वहीं चलना चाहिए । किन्तु जब स्वर्ग के विषय में विचारते हैं , तो श्रीराम का यह उपदेश ‘ एहि तन कर फल विषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अन्त दुखदाई ।। ' सामने आ जाता है । वहाँ भी सुख के बाद दुःखः , दु : ख के बाद सुख - ऐसे ही आते - जाते रहते हैं , जैसे गाड़ी का पहिया ' चक्रवत् परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च । ' उसी प्रकार हमलोगों के पीछे सुख - दुःख घूमते रहते हैं । दिन - ही - दिन रहे , रात न हो , ऐसा हो नहीं सकता । किन्तु लोग दुःख को नहीं चाहते , सुख ही चाहतेहैं । सुख भी ऐसा हो , जो तृप्तिदायक , कल्याणदायक तथा पूर्ण शान्तिदायक हो । किन्तु ऐसा सुख नहीं मिलने पर मालूम होता है कि यथार्थ में ऐसा सुख ही नही । जैसे कोई जन्मांध कहे कि रूप है ही नहीं , तो क्या यह विश्वास - योग्य है ? संतों ने जो उस सुख को प्राप्त किया , वे दृढ़ता के साथ कहते हैं कि ऐसा सुख भी अवश्य है । अगर ऐसा सुख नहीं होता , तो क्या सन्त लोग झूठ - मूठ अपनी वाणी में कहते ? अथवा क्या यह गप है ? किन्तु उनकी बातों पर दृढ़ होने से यह ज्ञात होता है कि वे मिथ्या नहीं बोल सकते । क्या झूठ बोल कर ही वे लोग साधु - सन्त कहलाए ? कभी नहीं । उनलोगों से पूछने पर मालूम होता है कि लोग जो साधारण रीति से दुःख - सुख जानते हैं , वह इन्द्रियजन्य दुःख - सुख है । यह विषय - सुख है - विषयानन्द है । विषय - सुख परिवर्तनशील , क्षणभंगुर सुख है । इन्द्रियों में वह पूरी - पूरी शक्ति भी नहीं है , जो विषयों को पूर्णरूपेण भोग सकें तथा पूर्ण तृप्ति प्राप्त कर सकें । जिसमें पूर्ण शक्ति ही नहीं , वह विषय को पूर्णरूपेण भोग कैसे सकती है तथा उससे जो तृप्ति हो , वह पूर्ण कैसे ? वह अनित्यानन्द है । इसके अतिरिक्त कुछ और है , जो इन्द्रियगम्य ( पाँच कर्मेन्द्रियाँ - हाथ , पैर , गुदा , लिंग तथा मुँह ; पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ - आँख , कान , नाक , जिह्य तथा त्वचा ; चार अंत : करण - मन , बुद्धि चित्त और अहंकार - कुल चौदह इन्द्रियाँ ) नहीं है । वह इन्द्रियों से परे क्या है ? इन्द्रियों के ज्ञान से परे चेतन आत्मा है । इससे जानने अथवा ग्रहण करने योग्य जो पदार्थ , उस पदार्थ को प्राप्त कर लेने पर सुख - ही - सुख है , दुःख लेशमात्र भी नहीं है । वह पदार्थ क्या है ? ईश्वर । वह केवल  चेतन - आत्मा से जानने योग्य है । चेतन - आत्मा क्या है ? जब इस पर विचारते हैं , तो पता चलता है कि इस शरीर में मैं रहता हूँ ; मेरी आँखें , मेरे हाथ , मेरे पैर , मेरा शरीर आदि कहकर जानता हूँ , किन्तु अपने को नहीं पहचानता । अपने स्वयं कौन हैं ? इसपर सन्त सुन्दरदासजी की यह वाणी सुनिए तू तौ कछु भूमि नाहिं , अप तेज वायु नाहिं । व्योम पंच विष (पाँच विषय - रूप , रस , गंध , स्पर्श  और शब्द ।) नाहिं , सो तौ भ्रम कूप है ।। तू तौ कछु इन्द्रिय रु , अन्तःकरण नाहिं । तीन गुण तू तौ नाहि , न तौ छाहिं धूप है ।। तू तो अहंकार नाहिं , पुनि महतत्त्व नाहिं । प्रकृति पुरुष नाहिं , तू तौ स्व अनूप है ।। सुन्दर विचार ऐसे , शिष्य तूं कहत गुरु । नाहिं नाहिं कहत रहै , सोई तेरो रूप है ।। --सुन्दरदासजी  ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी । -गोस्वामी तुलसीदास 

    इस प्रकार अपने शरीर में रहने का बौद्धिक ज्ञान तो हो जाता है ; किन्तु यथार्थ में मैं कौन हूँ , इसकी पहचान नहीं होती । अपनी पहचान नहीं होने पर भी यह ज्ञान अवश्य बना रहता है कि ' मैं हूँ ' तथा ये ( पंच ज्ञान की , पंच कर्म की तथा चार अंतर की ) इन्द्रियाँ मेरी हैं , मैं इनसे भिन्न हूँ । किन्तु जिस तरह मैं अपने शरीर को पहचानता हूँ , उस तरह अपने को नहीं । अपने की पहचान नहीं होने का क्या कारण है ? इसपर सन्त लोग बतलाते हैं कि तुम अपने को इन्द्रियों से जानना चाहते हो , यह कैसे होगा ? तुम अन्दर में हो और इन्द्रियों को बाहरी विषयों का ज्ञान है , अन्तर का नहीं । इसलिए तुम अपने को तभी पहचान सकते हो , जब तुम अपने अन्तर में प्रवेश करो तथा शरीर के घेरे से अगुन पार हो जाओ । शरीर का तात्पर्य यह नहीं कि  केवल स्थूल शरीर को पार करो , बल्कि जड़ के चारो ( स्थूल , सूक्ष्म , कारण तथा महाकारण ) शरीरों को भी पार करो । तब पता चलेगा कि तुम कौन हो तथा उसे अकेलेपन में अर्थात् चारो जड़ शरीरों से छूटकर कैवल्य दशा में रहने पर जो सुख मालूम होगा , वह कौन सुख है ? वह हरि - रस का सुख है । उसी को पाने का यत्ल करो , तभी वह सुख मिलेगा , जिसके बाद दुःख नहीं , जो सुख कभी बिछुड़नेवाला नहीं , जिसमें उकताहट नहीं , जो तृप्तिदायक , कल्याण दायक तथा पूर्ण शान्तिदायक है ।

     यत्ल क्या है ? ईश्वर - भजन करो , इसी से सब क्लेश ( दुःख ) मिट जाएँगे । राकापति पोड़स उअहिं , तारागन समुदाय । सकल गिरिन्ह दब लाइये , बिनु रवि राति न जाइ ।। ऐसेहि दिनु हरि भजन खगेसा । मिटइ न जीवन केर कलेसा ॥ -गोस्वामी तुलसीदासजी 

    पूर्णिमा के सोलह चन्द्रमा ( अथवा सोलह कलाओं से युक्त चन्द्रमा ) उगें ; तारेगणों के सब झुण्ड भी उगें , सब पर्वतों में आग लगा दी जाय , परन्तु बिना सूर्य के रात नहीं जाती । हे गरुड़जी ! इसी प्रकार बिना हरि - भजन किए जीवों का क्लेश नहीं मिटता ।

     ईश्वर का भजन करने के लिए उसके स्वरूप को जानना आवश्यक हो जाता है । इसलिए उसके स्वरूप की खोज करने जब चलते हैं , तब गोस्वामी तुलसीदासजी तथा संत कबीरदासजी के वचन सामने आते हैं राम स्वरूप तुम्हार , वचन अगोचर बुद्धि पर । अविगत अकय अपार , नेति नेति नित निगमकह ।। व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता । अखिल अमोषसक्तिभगवन्ता ।। अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सब दरसी अनवय अजीता ।। निर्मल निराकार निर्मोहा।नित्य निरंजन सुख सन्दोहा ।। प्रकृति पारप्रभुसब उरबासी ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥इहाँमोह कर कारन नाहीं । रबिसन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥ भगत हेतु भगवान प्रभु , रामधेरेउ तनु भूप । किये चरित पावन परम , प्राकृत नर अनुरूप ।। जथा अनेकन वेषधरि , नृत्य करइ नट कोइ । सोइ सोइ भाव देखावइ , आपुन होइन सोइ ।। -गोस्वामी तुलसीदासजी

नाद बिन्दु तें अगम अगोचर , पाँच तत्ततें न्यार । तीन गुनन ते भिन्न है , पुरुष अलक्ख अपार ।। संपुट माहिं समाइया , सो साहिब नहिं होय । सकल मॉड में रमि रहा , मेरा साहिब सोय ।। सर्गुण की सेवा करौ , निर्गुण का करु ज्ञान । निर्गुण सर्गुण के परे , तहैं हमारा ध्यान ।। कस्तूरी कुण्डल बसै , मृग दूँदै वन माहि । ऐसे घट में पीव है , दुनिया जानै नाहिं ।। ' ' श्रूप अखण्डित व्यापी चैतन्यश्चैतन्य । ऊँचे नीचे आगे पीछे दाहिन बायें अनन्य ।। बड़ा तें बड़ा छोट तें छोटा मीही ते सब लेखा । सबके मध्य निरन्तर साई दृष्टि दृष्टि सों देखा ।। चाम चश्म सा नजरिन आवै खोजुरूह के नैना । चून चगून वजूद न मानु ते सुभा नमूना ऐना ।। जैसे ऐना सब दरसावै, जो कुछ वेष बनावै । ज्यों अनुमान कर साहब को, त्यों साहब दरसावै ।। जाहि रूप अल्लाह के भीतर तेहि भीतर के ठाई । रूप अरूप हमारि आस है हम दूनहुँ के साई ।। जो कोउ रूह आपनी देखा सो साहब को पेखा । कहै कबीर स्वरूप हमारा साहब को दिल देखा ।। ' -कबीर साहब

अब गुरु नानक साहब के पास चलो , वे क्या कहते हैं अलख अपार अगम अगोचरि , ना तिसु काल न करमा ॥ जाति अजाति अजोनी संभउ , नातिसु भाउ न भरमा । साचे सचिआर बिटहु कुरवाणु । नातिसु रूप वरनु नर्हि रेखिआ साचे सबदि नीसाणु ॥  नातिसु मात पिता सुत बंधप, नातिसुकाम न नारी । अकुल निरंजन अपर परंपरु सगली जोति तुमारी ॥ घट घट अंतरि ब्रह्म लुकाइआ, घटि घटि जोति सवाई । बजर कपाट मुकते गुरमती निरभै ताड़ी लाई ॥ 

    ऊपर वर्णनानुसार जैसे गोस्वामी तुलसीदासजी के ' अविगत अकथ अपार ' , ' अखण्ड अनन्ता ' , कबीर साहब के ' पुरुष अलक्ख अपार ' , ' श्रूप अखण्डित ' तथा गुरु नानक के ' अलख अपार अगम अगोचरि ' से सन्तों की वाणी में ' अनन्त , अपार ' शब्द आता है , इन्हीं को ईश्वर - परमात्मा कहकर पुकारते हैं । अगर कहें , ऐसा हो सकता है कि नहीं ? अगर कहें , नहीं हो सकता है , तो विचारिए - जो कुछ होगा , अगर सब सीमावाला ही होगा , तो सब ससीमों को एकत्रित करने पर क्या होगा ? ससीमों का पुंज भी ससीम ही होगा , असीम नहीं होगा । साथ ही यह प्रश्न उठेगा कि सब ससीम पदार्थों के पार में क्या है ? यह प्रश्न तबतक हल नहीं हो सकता , जबतक कि असीम न कह दें । इसलिए संतों की वाणियों में जो ' अनन्त - अपार ' शब्द आता है , वह अतिशयोक्ति नहीं , यथार्थ ही जंचता है । एक अनादि अनन्त तत्त्व अवश्य है इसमें तर्क का स्थान नहीं है । लोग बहस करते हैं , ईश्वर को नहीं मानते हैं । कहते हैं कि ' आस्तिकवादियों ने ईश्वर को अपने विचार में बना लिया है , यथार्थतः ईश्वर की स्थिति है ही नहीं । ' इस विचार का भी प्रचार हो रहा है , किन्तु ऐसा विचार मन में धंसता नहीं । बचपन से ही माता - पिता ने राम - राम , शिव - शिव , कृष्ण - कृष्ण आदि कहलाया तथा इन्हीं शब्दों से मस्तिष्क भर दिया है । तभी से श्रद्धा आई और जमी हुई है । जिस समय तर्क - वितर्क का ज्ञान नहीं था , पाठशाला में पढ़ने गए , पण्डित ने कहा- यह ' अ ' है । बस , इसमें कुछ भी तर्क वितर्क नहीं किया , वैसे ही लिखा और पढ़ा । सीखते - सीखते सीखा , तो इसका ज्ञान अब होता है कि पंडितजी ने बचपन में जो - ' अ ' पढ़ाया था , ठीक है । साथ ही इसका भी ज्ञान हुआ कि पहले की वर्णमाला से आजकल की वर्णमाला में क्या अन्तर है । पहले की वर्णमाला की लिपि या लिखावट से आजकल की वर्णमाला की लिपि या लिखावट में परिवर्तन हो गया है । फिर आगे और भी इसमें परिवर्तन हो संभव है । किन्तु उच्चारण में वर्णमाला नहीं बदलेगी , सदा पूर्ववत् रहेगी , उसी प्रकार ईश्वर है और रहेगा । एक अनादि अनन्त असीम तत्त्व का मानना आस्तिक और नास्तिक - दोनों के लिए अनिवार्य है । उस तत्त्व का नाम बदलकर दोनों भले ही स्वीकारात्मक और नकारात्मक भिन्न - भिन्न नामों से कह सकते हैं ; परन्तु उसकी स्थिति को नहीं मिटा सकते हैं । इसपर तर्क करना व्यर्थ है । तर्क क्या है ? तर्क तो बुद्धि से होती है ; किन्तु परमात्म स्वरूप - ज्ञान के लिए बुद्धि भी लँगड़ी है । बुद्धि से केवल निर्णय होता है ; किन्तु पहचान नहीं होती ; क्योंकि वह तो ' वचन अगोचर बुद्धि पर ' है । उस परमात्मा को प्राप्त करने का जो यत्ल है , वही उसकी भक्ति है । या यों कहो कि जिस यत्न के द्वारा परमात्म - स्वरूप की प्राप्ति हो , वही भक्ति है । जिस प्रकार जिह्वा पर मिसरी डालने से मीठी मालूम होती है , उसी प्रकार परमात्मा का प्रत्यक्ष ज्ञान हो । सूचै भाड़े साचु समावै विरले सूचाचारी । तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुम्हारी ।। 

    अर्थात् पवित्र वर्तन में सत्य अँटता है । -'पवित्र वर्तन कहने का तात्पर्य है - शुद्ध अन्तःकरण । ' साचु ' का अर्थ है - सत्यब्रह्म । अन्तःकरण की शुद्धि के बिना सत्यब्रह्म को नहीं प्राप्त कर सकते । उत्तम विचार से अन्तःकरण की शुद्धि होती है ; उत्तम विचार भले लोगों के संग से होता है । भले लोग उसे कहते हैं , जो आत्मानन्द के विषय में जानते हैं , उसकी प्राप्ति के लिए इच्छुक हैं और जो प्राप्त कर गए हैं , उनके लिए तो कहना ही क्या है ! उनका संग ही सत्संग है । जिन्होंने आत्मानन्द को प्राप्त किया है , उनकी पहचान दुर्लभ है , फिर भी वे अपना गुण कुछ - न - कुछ अवश्य देंगे । घटा में छिपा हुआ सूर्य अपनी गर्मी देने से चूकता नहीं है , उसकी गर्मी हमलोगों तक आती है । उसी प्रकार सन्त अपने स्वभाव के कारण कुछ दिए बिना नहीं रहते । कबीर संगति साधकी , ज्यों गंधी का बास । जो कुछ गंधी दे नहीं , तो भी वास सुवास ।। -कबीर साहब 

    ईश्वर की प्राप्ति के लिए पापों से बचिए । पापों से बचना अन्तःकरण की शुद्धि पर निर्भर है । झूठ बोलना पाप है । झूठ नहीं बोलना चाहिए । लोग अपना दोष छिपाने के लिए अथवा कुछ ठगने के लिए झूठ बोलते हैं । झूठ सब पापों का भण्डार है । किसी ने खराब काम किया , उससे पूछने पर उसने बोल दिया - नहीं , मैने नहीं किया । गोया झूठ की आड़ में उसको छिपा लिया । अत पापों से बचने के लिए झूठ मत बोलो । चोरी मत करो । नशा न खाओ , न पियो । तम्बाकू तक नशा है । भाँग तमाखू छूतरा , अफयूँ और शराब । कह कबीर इनको तजै , तब पावै दीदार ।। दारू गाँजा भांग अफीमा । ताड़ी चण्डू मदक कोकीना ।। सहित तम्बाकूनशा है जितनातजन योग्यतजडारो तितने ।। कबीर साहब

    नशीली वस्तु के सेवन से मस्तिष्क अच्छा नहीं रहता । नशा लगते - लगते ऐसा हो जाता है कि शरीर तक को बर्बाद कर देता है । व्यभिचार मत करो अर्थात् पुरुषवर्ग स्त्री को तथा स्त्री - वर्ग पुरुष को कुदृष्टि से अवलोकन न करे ; बल्कि “ परदारा निज माता जान । ' हिंसा मत करो । हिंसा उत्तम ध्यान - ज्ञान से वंचित रखती है । जानवरों का मारना हिंसा है । कटु वचन कहना , दूसरे की हानि के लिए कुछ  काम कर देना हिंसा है । इसलिए मन , वचन तथा कर्म ; तीनों तरह की हिंसा से बचो । हिंसा दो प्रकार की होती है - एक वार्य , दूसरी अनिवार्य । अपनी रक्षा के लिए श्वास लेते हैं , इससे भी हिंसा होती है ; किन्तु यह अनिवार्य हिंसा है । एक देश पर दूसरे देश के लोग चढ़ाई करें या लूटे अथवा किसी के घर में डकैती हो , ऐसी हालत में अपनी रक्षा के लिए उसपर चढाई करनी , मार - काट करनी अनिवार्य हिंसा है । घर के लेप - पोत , बुहारने , खलिहान करने आदि में हिंसा है ; किन्तु अनिवार्य हिंसा है । किसान खेती का काम करते हैं , इसमें भी हिंसा होती है , किन्तु वह भी अनिवार्य हिंसा है । अनिवार्य हिंसा का प्रायश्चित्त होता है ; किन्तु वार्य हिंसा का प्रायश्चित्त नहीं होता । खेती आदि अनिवार्य हिंसा के प्रायश्चित्त के लिए लोग दान पुण्य करते हैं , अभ्यागत - सत्कार करते हैं । पहले अभ्यागत सत्कार करो , पीछे अपने खाओ । अब वार्य हिंसा के विषय में भी थोड़ा - सा सुन लीजिए । वार्य हिंसा उसे कहते हैं , जिसके बिना हम बच सकते हैं । इस प्रकार पंच पापों से बचने के लिए सन्त - महात्मागण उपदेश करते हैं । साथ ही मांस - मछली का भोजन भी मत करो ; क्योंकि इसमें भी हिंसा होती है । मनुस्मृति में आठ घातक लिखे हैं -१ . हिंसा करने के लिए आज्ञा देनेवाला , २. हिंसा करनेवाला , ३ . टुकड़ा करनेवाला , ४. बेचनेवाला , ५. खरीदनेवाला , ६. पकाने ( राँधने ) वाला , ७. परोसनेवाला तथा ८ . खानेवाला । दूसरी बात यह है , भोजन में अपना अपना गुण कुछ - न - कुछ अवश्य रहता है । अगर अपना - अपना गुण अलग - अलग नहीं होता , तो भाँग खाने पर नशा क्यों आता ? स्वर्ण - भस्म खाने पर जितनी गर्मी आती है , गोयठे को जलाकर खाने से उतनी गर्मी क्यों नहीं आती ? इससे प्रत्यक्ष है कि भोजन अपना - अपना गुण रखता है । हमारे शरीर जो परमाणु हैं तथा पशु शरीर में जो परमाणु हैं , दोनों एक ही गुणवाले नहीं हैं । पशुओं के परमाणुओं में विशेष अन्धकार और अज्ञानता है । हमारे अन्दर में भी अज्ञानता तो है ही , परन्तु पशुओं से कम । फिर पशुओं को खाकर , उनके परमाणु को अपने शरीर में बढ़ाते हैं । इसलिए ईश्वर भक्ति में ये बाधक हैं । कबीर गुरु की भक्ति का , मन में बड़ा हुलास । मन मनसा मांजे नहीं , होन चहत है दास ।। 

उपनिषद् में है- नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ।। -कठ , द्वितीय वल्ली , अध्याय १

     जो पापकर्मों से निवृत नहीं हुआ है , जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है , वह इसे आत्मज्ञान - द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिए पापों का परित्याग कर ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए ; क्योंकि हमें सुख की अभिलाषा है । सुख की प्राप्ति के लिए हमें यत्न करना चाहिए , केवल ' सुख - सुख ' कहने से सुख नहीं होगा । वह यल ईश्वर - भजन है । इसी से परम शान्तिमय सुख मिलेगा । ०

इस प्रवचन के बाद वाले प्रवचन नंबर 12 को पढ़ने के लिए यहां दबाएं।

प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के इस प्रवचन का पाठ करके आपलोगों ने जाना कि सुख की परिभाषा,सबसे बड़ा सुख क्या है? सुख किसे कहते हैं? दुख को सुख में बदलने की कला है ध्यान-योग आदि बातें। इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का संका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस प्रवचन के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का  सदस्य बने। इससे आपको आने वाले प्रवचन या पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। उपर्युक्त प्रवचन का पाठ निम्न वीडियो में किया गया है।




सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के विविध विषयों पर विभिन्न स्थानों में दिए गए प्रवचनों का संग्रहनीय ग्रंथ महर्षि मेंहीं सत्संग-सुधा सागर
महर्षि मेंहीं सत्संग-सुधा सागर
अगर आप "महर्षि मेंहीं सत्संग-सुधा सागर"' पुस्तक से महान संत सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस  जी महाराज के  अन्य प्रवचनों के बारे में जानना चाहते हैं या इस पुस्तक के बारे में विशेष रूप से जानना चाहते हैं तो   यहां दबाएं।

सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज की पुस्तकें मुफ्त में पाने के लिए  शर्तों के बारे में जानने के लिए.  यहां दवाए
S11, Definition of happiness and sorrow, where and how it is found, -महर्षि मेंहीं प्रवचन S11,  Definition of happiness and sorrow, where and how it is found, -महर्षि मेंहीं प्रवचन Reviewed by सत्संग ध्यान on 8/31/2019 Rating: 5

कोई टिप्पणी नहीं:

प्रभु प्रेमियों! कृपया वही टिप्पणी करें जो सत्संग ध्यान कर रहे हो और उसमें कुछ जानकारी चाहते हो अन्यथा जवाब नहीं दिया जाएगा।

संतमत और बेदमत एक है, कैसे? अवश्य जाने

     प्रभु प्रेमियों ! सत्संग ध्यान के इस प्रवचन सीरीज में आपका स्वागत है। आइए आज जानते हैं-सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज ने यह सि...

Ad

Blogger द्वारा संचालित.