S119, अन्तःकरण की शुद्धि ।। How to sanctify the mind ।। दि.१.७.१९५५ ई० प्रातः

महर्षि मेंहीं सत्संग सुधा सागर / 119

प्रभु प्रेमियों ! सत्संग ध्यान के इस प्रवचन सीरीज में आपका स्वागत है। आइए आज जानते हैं-संतमत सत्संग के महान प्रचारक सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज के हिंदी प्रवचन संग्रह "महर्षि मेंहीं सत्संग सुधा सागर" के प्रवचन नंबर 119 के बारे में। इसमें बताया गया है कि  शरीर की पवित्रता कैसे होती है? असली पवित्रता क्या है? सभी काम को कौन देखता है? मनुष्य का शरीर शिवालय और विष्णु मंदिर कब बनता है?

इसके साथ ही आप इस प्रवचन (उपदेश, अमृतवाणी, वचनामृत, सत्संग सुधा, संतवाणी, गुरु वचन, उपदेशामृत, ज्ञान कथा, भागवत वाणी, संतवचन, संतवचन-सुधा, संतवचनामृत, प्रवचन पीयूष )  में  पायेंगे कि-  शरीर की पवित्रता कैसे होती है? असली पवित्रता क्या है? सभी काम को कौन देखता है? मनुष्य का शरीर शिवालय और विष्णु मंदिर कब बनता है? ईश्वर भक्ति में जाती पाती और पढ़े-लिखे का कोई भेद नहीं है? क्या करने से मोक्ष मिलता है? अमीर और गरीब के दान में क्या फर्क है? इत्यादि बातों  के बारे में। इसके साथ-ही-साथ निम्नलिखित प्रश्नों के भी कुछ-न-कुछ समाधान इसमें मिलेगा। जैसे कि-  शिवालय का अर्थ, Shivalaya name meaning, पवित्रता का महत्व, मन को पवित्र कैसे करे, मन को कैसे जीते, पवित्रता की परिभाषा, मन को पवित्र करने का मंत्र, मन को एकाग्र कैसे करे, पवित्र कैसे रहे, दिमाग में बार-बार एक ही विचार आना, मन को साफ कैसे करे, मन को कैसे खुश रखे, पवित्र मन, मन को शुद्ध कैसे करे, कैसे हमारे मन ध्यान केंद्रित करने की? मन को एकाग्र चित्त कैसे करें? अपने माइंड को कैसे कंट्रोल करें? मन की एकाग्रता क्या है? इत्यादि बातें। इन बातों को जानने-समझने के पहले, आइए !  संत सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज का दर्शन करें।

इस प्रवचन के पहले वाले प्रवचन नंबर 118 को पढ़ने के लिए   यहां दवाएं। 


शरीर और अंतःकरण की पवित्रता कैसे होती है पर चर्चा करते गुरुदेव

११९ . अन्तःकरण की शुद्धि 

प्यारे लोगो ! 

     अपने शरीर को शौच से पवित्र करो । किंतु इतने से ही यह पवित्र नहीं होता है । हृदय की पवित्रता असली पवित्रता है हृदय में पाप - विचार न आने से हृदय पवित्र होता है ।  हृदय में पाप - विचार आने से पाप करते हैं । इस पाप - विचार से लोगों को डरना चाहिए । पाप - विचार करने से बाहर में लोग नहीं देखते हैं , किंतु परमात्मा सभी जानते और देखते हैं । यदि कोई पाप करता है, तो परमात्मा के सामने करता है ; क्योंकि परमात्मा सब जगह है । बाहर में भी यदि कोई किसी को पाप करते देख लेता है, तो लोग उसे दुरदुराते हैं । इसलिए पाप नहीं करना चाहिए । पाप करनेवाले को लोग लजाते भी हैं

     अपने शरीर की शुद्धि बाहर में शौचादि से और अंत : करण की शुद्धि पवित्र कर्म करने से होती है । तुम्हारा शरीर शिवालय है , विष्णु मन्दिर है । इसके लिए पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं । अपना अंतःकरण शुद्ध करना होता है । बाहर में लोग शिवालय , देवालय बनाते हैं । इससे संसार में भले कुछ प्रतिष्ठा हो , किंतु उससे मोक्ष नहीं मिलता । यदि अपने अंतःकरण को शुद्ध करता, तो उससे मोक्ष हो जाता । 

     संतों ने कहा कि यदि अपने को शुद्ध करके रखो तो तुम्हारा शरीर शिवालय है , इसमें शिवजी का दर्शन होता है । बाहर में लोग शिवलिंग को मोल लेते हैं , लोगों का बनाया हुआ । किंतु आप के अंदर ज्योतिरूप और नादरूप शिवलिंग परमात्मा का बनाया हुआ है । इसका ध्यान करते - करते परमात्मा मिल जाते हैं । इसलिए शब्द की बड़ी महिमा है । ज्ञानियों ने कहा कि जो अपने अंदर में ठाकुरजी को देखना चाहता है , वह अपने अंदर ध्यान करता है ।  शिवालय में नीचे जलढरी और उसके ऊपर में शिवलिंग रहता है । उसी तरह अपने शरीररूप शिवालय में ज्योतिविन्दु जलढरी और उसके ऊपर नाद शिवलिंग है । परमात्मा ने अमीर- गरीब , धनी - निर्धन , सबके लिए उनके शरीर में शिवजी की स्थापना कर दी है । सब कोई दर्शन कर सकते हैं । इसमें जाति - पाँति , धनी - निर्धन , विद्वान - अविद्वान की कोई बात नहीं । यदि जाति- पाँति की बात रहती तो कबीर साहब , गुरु नानक साहब कौन पढ़े - लिखे थे ? संत रविदास और  श्वपच भक्त कौन ऊँची जाति के थे ? 

     जैसे शिवालय को पवित्रता से रखते हैं , उसी तरह अपने शरीर को भी पवित्र रखो और जिस किसी ने संसार में बड़ा - बड़ा काम किया है , उसका नाम आज है ; किंतु उसको मोक्ष नहीं मिला । यदि अपने अंतर की सफाई रखे और ध्यान करे तो उसको मोक्ष मिलता है । 

     पंच पापों से बचो । संतों ने लोगों को मोक्ष प्राप्ति का ऐसा सरल उपाय बताया है कि लोग संसार में हैरान न हों ।  किसी को बहुत पैसा है , दान देता है , कुआँ बनाता है , पोखर बनाता है , मन्दिर बनाता है , लेकिन जिसके पास पैसे नहीं हैं , वह नहीं कर सकता है । लेकिन दान देने के सबंध में ऐसा जानना चाहिए कि यदि कोई लखपति है और कोई एकदम गरीब है , यदि अपनी - अपनी शक्ति के अनुकूल दोनों दान देते हैं यानी लखपति बहुत देता है और एक गरीब अपनी शक्ति के अनुसार थोड़ा ही देता है तो दोनों बराबर हैं । किंतु यह तो बाहर की बात है । असली बात है, अपने शरीर को , अपने अंत : करण को पवित्र रखो , ध्यान करो तो मोक्ष मिलेगा । सारे दुःखों से छूट जाओगे ।

( यह प्रवचन कटिहार जिलान्तर्गत श्रीसंतमत सत्संग मंदिर भंगहा गाँव में दिनांक १.७.१९५५ ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था । ) 


नोट-  इस प्रवचन में निम्नलिखित रंगानुसार और विषयानुसार ही  प्रवचन के लेख को रंगा या सजाया गया है। जैसे-  हेडलाइन की चर्चा,   सत्संग,   ध्यान,   सद्गगुरु  ईश्वर,   अध्यात्मिक विचार   एवं   अन्य विचार   । 


इस प्रवचन को महर्षि मेंही सत्संग सुधा सागर में प्रकाशित रूप में पढ़ें-
अंतःकरण की शुद्धि कैसे होती है महर्षि मेंही सत्संग सुधा सागर प्रवचन 119


इस प्रवचन के बाद वाले प्रवचन नंबर 120 को पढ़ने के लिए   यहां दबाएं।


प्रभु प्रेमियों ! गुरु महाराज के इस प्रवचन का पाठ करके आपलोगों ने जाना कि शरीर की पवित्रता कैसे होती है? असली पवित्रता क्या है? सभी काम को कौन देखता है? मनुष्य का शरीर शिवालय और विष्णु मंदिर कब बनता है? इत्यादि बातें।  इतनी जानकारी के बाद भी अगर कोई संका या प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस प्रवचन के बारे में अपने इष्ट मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने इससे आपको आने वाले प्रवचन या पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। उपर्युक्त प्रवचन का पाठ निम्न वीडियो में किया गया है।


सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के विविध विषयों पर विभिन्न स्थानों में दिए गए प्रवचनों का संग्रहनीय ग्रंथ महर्षि मेंहीं सत्संग-सुधा सागर
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